मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

मेरा मन

रश्मि सिंह

अब वायदे तुम्हारे तानों से ही तो लगते हैं हम एक हैं हम एक हैं ये नारों से ही लगते हैं। काश कि मैं रख पाती मन अपना तुम्हारी हथेली पर तितलियों सी ख्वाहिसों को मेरी सहला लेते फेरे पूरे होते ही तुमने धीरे से कहा हम एक हैं जब पहली तनख्वाह आई तुमने हक़ से कहा हम एक हैं तुम जब जब अकेले होते आसानी से कह देते हम एक हैं पर मेरा मन जो बस तुम्हारी हथेलियों पर रहना चाहा तुमने अपनी ख्वाहिसों की मुठ्ठी में कब का मसल डाला हाँ अब सारे वादे लगते बस नारे से हैं


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें