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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

खानाबदोस जिन्दगी मेरी तो हो गयी……

राज कुमार तिवारी 'राज'

जोग ले लिया तेरा जोगी मै बन गया। तेरे ही शहर में कहीं धूनी रमाऊंगा कब तक जटाऐं लेकर यूं ही फिरता रहॅूगा एक दिन मैं इसमें गंगा उतारूंगा जोग ले लिया तेरा.............. ख्वाहिश थी तेरी मैं नेस्तनाबूत हो जाऊं हर तरफ से आज मै वीरान हो गया! खुशियाँ मनाओ आज तुम, अरमान पूरे हो गये उजड़े इसी दयार को मै संगम बनाऊंगा जोग ले लिया तेरा.............. अभी खमोश हूँ मैं यहां चुपचाप बैठा हूं इंद्रियाँ सारी कहीं पे जुटी मेरी होश में जो आऊँगा तो, दुनिया ये देखेगी चाँद पे मैं एक दिन विक्रम उतारूंगा जोग ले लिया तेरा.............. शीशे भी चटकेगें, बादल भी गरजेंगें, आँधियाँ कई बहुत तेज आयेंगी पौधे भी टूटेगें कई, उस दिन पेड़ उखडेगें जिस दिन यहाँ पे मेघ-मल्हार गाऊँगा जोग ले लिया तेरा.............. महलों में होने का यहाँ गुरूर न करो खानाबदोस जिन्दगी मेरी तो हो गयी उस दिन यहां पे कई (राज) तैरेगें जिस दिन यहाँ पे कोई सुनामी लाऊँगा जोग ले लिया तेरा..............

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