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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

मैं सीता सती हूँ

डॉ. प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

यूँ शंकाओं के प्रश्नो के कटघरे में ला खड़ा किया है मुझे। थोथे कटाक्ष झूठे गवाह यह कैसी विडम्बना है? सत पर कैसी शंका? कैसा दुराव? मैं कहती हूँ ---- मैं अब भी सती हूँ मैं सीता सती हूँ। ‘हूँ’----‘हूँ’ क्या? मेरे पास तर्क हैं तर्कों के अर्थ हैं अर्थों से घिरी नारी है मात्र नारी ही नहीं ---- उसकी अनन्त लाचारी है। चाहे मैं धरती से जन्मी नहीं विदेह जनक की पालित नहीं पल-पल, पग-पग, धरती मैं गढ़ती तो हूँ। केवल नारी होने से जल-जल मरती तो हूँ। फिर भी अपने बल बूते पर खड़ी तो हूँ। मैं कहती हूँ ---- मैं अब भी सती हूँ मैं सीता सती हूँ। नकारती ममता का बोझ ढोती रही मेरी माँ क्या मैंना न थी? संस्कारों से बँधे पिता की समाज से दबी माँ की आशाओं को तोड़ा मैंने उन्मुक्त यौवन के अल्हड़पन में। कई युगल नेत्रों के बोझ तले दबा- स्वयंवर! कइयों के हृदय की चाह बनी मैं। नेह सत है तो रूढ़ियों की प्रत्यंचा चढ़ेगी। भैातिक अन्तर से क्या सत्य छिप जाता है? कालचक्र है धनुष रूढ़ियों का उसे टूटना है, वह टूट जाता है। उसे तोड़ने में मैं बस हेतु बनी हूँ। मैं कहती हूँ ---- मैं अब भी सती हूँ मैं सीता सती हूँ। राम-सीता से सीता-राम की दौड़ पुरूष का कँधा ठेल मैंने जब भी आगे बढ़ना चाहा। मिला स्वर्ण-मृग का छलावा। पर्ण कुटी की देहरी लांघ लंबी गैलरी से --- टक्क-टक्क सैंडिलों का बुलावा। टाइपराइटर पर थिरकती उंगलियां फाइलों से जूझती आँखें स्तब्ध अटक जाती रही लम्बी घन्टी-ध्वनि जब भी सुनाई दी। बॉस के कक्ष से आई घन्टी-ध्वनि। कई जोड़ी व्याघ्र आँखें तन-बदन बेंध जाती रही। उन पैने दृष्टि तीरों से बचती बचाती। बनवास काटती रही हूँ। मैं कहती हूँ ---- मैं अब भी सती हूँ मैं सीता सती हूँ। फिर भी संशय का विष परत-दर-परत फैलता रहा। नित्य-प्रति अग्नि-परीक्षा से मेरा अन्तर्मन झुलसता रहा, स्वराज के सपने, मुक्त आशाएं, शूल बन चुभते रहे। तुम्हारी अतृप्त भावनाएं मर्यादा बन झकझोरती -- जगाती तुम्हें। विश्वास के अमृत में धीरे-धीरे घुलता गया विष। और फिर ---- अनंत बनवास। मुझमें, तुममें और आने वाली पीढ़ियों में बंट जाता रहा। कई फैली खाइयां संबन्धों में पड़ने को होती। देह अपनी दबा, उन्हें पाटती रही हूँ। मैं कहती हूँ ---- मैं अब भी सती हूँ मैं सीता सती हूँ। सती की परिभाषा तुम से बहुत परे है तुम मानते हो सती है वो जो प्राणों का उत्सर्ग करे है। लेकिन नहीं --- छल है तुम्हारा, वहम ये। मिट जाना कोई सत्य नहीं जीवित ज़िन्दा जल जाना भी सत्य नहीं अकर्मण्य बन सहते जाना भी सत्य नहीं। सत्य शाश्वत है जीवंत अस्तित्व ही सत्य है। सूक्ष्म हृदय की गहराई से उठा दृढ़ संकल्प से पोषित कर्तव्य-त्याग से पालित कलंक-कीर्ति से विमुख जो बढ़ता है सत्कर्म पर जो छा जाता है सृष्टि के कण-कण में सूर्य-सा सभी अवरोधों को पार कर वही सत् है। जो मर कर भी नहीं मरता। तन दाह छलावा है यूं जल-जल मर-मिटना भुलावा है। दुःखों से पलायन मात्र। तिल-तिल जलने से आलोक बनती रही हूँ अपने दुःखों पर सदा अशोक बनती रही हूँ। धरा बन मैं कष्ट सहती रही हूँ। मैं कहती हूँ ---- मैं अब भी सती हूँ मैं सीता सती हूँ। मैं अब भी सती हूँ मैं सीता सती हूँ।


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