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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

बचपन और यौवन

प्रदीप कुमार तिवारी

बचपन के आगे यौवन पर्वत दीखलाई पड़ता है, उन्नत वक्षस्थल कर बलवीर दिखलाई पड़ता है। पर्वत सुमेरु सा सीना ताने उन्नत होता जाता है, घनघोर घमंड लिये घट में बढ़ता दिखलाई पड़ता है।। गर कहीं मिले बचपन आगे डांट डपट आगे बढ़ता है, गलती खुद की हो पर यह बचपन के ऊपर ही चढ़ता है। मासूम मगर अंजान नहीं हर भाव समझता है बचपन, सम्मान मिटे ना यौवन की इस लिए सहज सब सहता है।। यौवन और बुढ़ापे की सब सुनता है यह बचपन, यौवन की सब भूल खटकती उमर चढ़े जब पचपन। तब लगता है चढ़ी जवानी सारी कसर निकालेगी, ऊर्जा से मदमस्त हुआ युवा हुआ है जबसे बचपन।।

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