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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

काल शोर तब करता है

जया पाण्डेय 'अन्जानी'

काल शोर तब करता है 'जीवन' सहसा डरता है वर्षावन कहलाने वाला वही अमेज़न जलता है यह कवच हिमालय का जीवन कितना खोया है पूछो खारे सागर से तुम ये पर्वत कितना रोया है शहर नहीं, महामारी है मानव फिरभी सोया है इस माटी की छाती पर कितना पत्थर बोया है फसल भरी इमारत की करती जीवन है जर्जर धूप , हवा , ना मिट्टी है शहर कहो या मुर्दाघर! सड़क जहाँ भी जाती है धुआँ ज़हर सब लाती है नागिन काली ये डसकर गाँवों को शहर बनाती है संसाधन का दोहन करने जेसीबी जबभी बढ़ता है वो बूढ़ा बरगद है लेकिन मरते दमतक लड़ता है मानव का स्वार्थ चरम पर सजीव जगत ठुकराता है निर्जीव मशीनें बना-बनाके निर्जीव स्वयं बन जाता है वनवृक्षों को काट-छाँटके मानव व्यापार उगाता है पर जानो प्रलयकाल में काम नहीं धन आता है किसने वन व्यापार बनाया किसने सब मरयादा लाँघि सूरज नदियाँ धरती अम्बर किसने तुमसे कीमत माँगी तुम जागोगे... तुम जागोगे... उष्णताप को समझोगे तुम जब हृदय तुम्हारा पिघलेगा वही समन्दर जब क्रोधी हो सब कूड़ा-करकट उगलेगा जब फटेगा धैर्य धरा का मुख से ज्वाला निकलेगी खड़ी मीनारें शान से जो सबको धरती निगलेगी मिट्टी के शव पर उगनेवाले ये शहर तुम्हें जब कुचलेंगे जंगल काटके मंगल जाके और प्राण उगा के रह लेंगे नहीं... नहीं... इतना यह आसान नहीं मानव तुम भगवान नहीं बात मानो इतना जानो बचाएगा 'विज्ञान' नहीं तब मृत्यु कोलाहल होगा चारों ओर 'हलाहल' होगा जब दंश भयावह देखेगा विज्ञान भी घुटने टेकेगा हे मनु के वंशज जागो ! धरणी की आग बुझाओ जातपात का बीड़ा छोड़ 'वसुधैव कुटुम्ब' बचाओ! 'वसुधैव कुटुम्ब' बचाओ!

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