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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

तुम कहां चली गई मां

गरिमा

तुम कहां चली गई मां, मेरी अंतरात्मा तुम्हें पुकार रही है मां, आकर मेरी मुश्किल हल कर दो मां, मेरा आंचल खुशियों से भर दो मां, मेरा अंतर पुकार रहा है मां, तेरी बहुत कमी महसूस हो रही है मां, हर पल साथ रहती थी तुम मां, मेरी आत्मा की आवाज सुन लेती थी मां, मेरी छोटी छोटी बातों को समझ लेती थी मां, मेरा अंतस पुकार रहा है मां, आ जाओ फिर से तुम मा, तेरी गोदी में लोरी सुनना है मां, तेरी छोटी छोटी बातों को सुनना है मां, वेदांत पुकार रहा है मां, तेरे हाथों का खाना अच्छा लगता था मां, वह सरसों का साग और मक्के की रोटी बहुत याद आता है मां, आ जाओ फिर से तुम जीवन में मां, तेरी बहुत कमी महसूस होती है मां, मेरा अंतस पुकार रहा है मां।।


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