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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

एक हैं "अटल"

अपूर्व कुशवाहा

उत्कृष्ट - उत्साही, मुख्य - महान अनंत छवि को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि...

'समझौता', कारगिल, पोखरण; दर्शा गया "बिहारी जी" का प्रण । अनंत - अविरल सरिता बहेगी सदा 'आपके' स्वप्नों से जुड़ेगा कर्मों का तृण।। परिपक्व प्रांजल मातृभाषा से, जब गूँज उठा था 'संयुक्त राष्ट्र संघ'! देशोत्थान की हृदयाशा से, प्रत्येक देशभक्ति को लग गए पंख।। ऐसे कहाँ गुम हुए श्री अटल! रिक्त हुआ 'माँ भारती' का मानस पटल। जब उमड़ पड़ा धरती - अम्बर; भारत माँ की गोद पुनः हुई विह्वल ।। पुनः हुई विह्वल ।। पुनः हुई विह्वल ।।

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