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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

क्यों रूठे हुये रहते हो

डॉ० अनिल चड्डा

                  
तुम क्यों 
जग से 
रूठे हुये रहते हो
क्यों 
हर बात पर
टूटे हुये रहते हो 
जख्म होते हैं 
तो होने दो 
जख्म रिसते हैं तो 
रिसने दो 
दर्द की गर 
कोई दवा नहीं 
तो दर्द ही होने दो 
स्वयं को 
इस दर्द का 
आदि होने दो 
क्या पता 
कल ये दर्द ही 
तुम्हारी दवा बन जाये 
ये कुछ ऐसा कर जाये
कि 
दर्द देने वाले 
हैरान रह जाएँ
कैसे दर्द भरे जहाँ में
तुम हँस पाते हो 
चाहे वो 
दर्द छुपाने के लिए ही हो 
  

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