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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

हादसों के बीच पला हूँ

अजय प्रसाद

हादसों के बीच पला हूँ खुद के लिए ही बला हूँ नूर यूँ ही नहीं है चेह्रे पे हँस कर गमों को छला हूँ मन्नतें कभी पूरी नहीं दुआओं को भी खला हूँ । छाछ हूँ फूँक कर पीता यारों मैं दुध का जला हूँ । मंज़िल कि है तलाश मुझे अकेले ही सफर पे चला हूँ । हाँ,इक बुरी लत है मुझमें चाहता सबका मैं भला हूँ ।

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