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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

ख़ुदा है कहाँ ?

जस राज जोशी ‘लतीफ़ नागौरी’

रशीद मियां बिना तर्क किये किसी विचार पर एक मत नहीं होते, वे हमेशा हर विषय के मुद्दे पर बहस करके बाल की ख़ाल खींचा करते थे ! इस कारण मोहल्ले का कोई मुरीद उनसे किसी बात पर उलझता नहीं ! एक बार ऐसा हुआ, सबाह-सबाह उनकी मुलाक़ात हो गयी मियाँ अल्लानूर से ! मियां अल्लानूर अभी-अभी मस्जिद से वहीदुद्दीन साहब की तक़रीर सुनकर ही आये थे ! और, तभी जनाब रशीद मियां ने उनको आवाज़ दे डाली “अरे ओ मियां अल्लानूर ! कहां से आ रिया हो, मियां ?”

“ज़रा मस्ज़िद से वहीदुद्दीन साहब की तकरीर सुनकर आ रिया हूँ, मियां !” पास आकर सकुचाते हुए मियां अल्लानूर ने कहा !

“यानी ख़ुदा के घर..? अरे मियां, खुदा है कहाँ ? साफ़-साफ़ कहो ना, पनवाड़ी की दूकान से पान खाकर आ रिया हूँ ?” मज़ाक उड़ाते हुए, रशीद मियां बोल उठे !

एक तो उनको ख़ुदा पर अटूट भरोसा, और दूसरी बात अभी-अभी वहीदुद्दीन साहब की तक़रीर जो उनके दिमाग में छायी हुई थी ! बरबस मियां अल्लानूर बोल उठे “मियाँ ! ज़बान संभालकर बात कीजिये, ख़ुदा को वही इंसान समझ सकता है, जो उसके नूर को पहचानता है ! समझे, मियां रशीद ?”

तभी न जाने कहाँ से रशीद मियां के लख्ते जिगर वहीद मियां वहां आ पहुंचे, वहीद मियाँ काफ़ी घबराए हुए थे, अब्बा हुज़ूर को वहां खड़े पाकर वे निकट आये ! और, कह उठे “अब्बा हुज़ूर ! जल्दी से मुझे पांच हज़ार रुपये दीजिये, अस्पताल में भर्ती अम्मी जान का ऑपरेशन होना है....डॉक्टर ने क़रीब पांच हज़ार रुपयों की दवाइयां मंगवाई है, जल्दी कीजिये अब्बू !” अब ना तो मियां रशीद की ज़ेब में इतने रुपये, और न वे बैंक जाकर खाते से पैसे निकलवा सकते थे..क्योंकि आज़ का दिन ठहरा इतवार ! फिर क्या ? बेचारे रशीद मियां का मायूस चेहरा भांपकर, रहमदिल मियाँ अल्लानूर ने अपनी जेब से पांच हज़ार रुपये निकाले और उनकी हथेली पर रुपये रखकर बोल उठे “जल्दी करो, रशीद मियाँ ! तुरंत अस्पताल पहुँचो, दवाइयां लेकर !” अब घबराये हुए मियाँ रशीद की फिक्र काफ़ूर हो गयी, और वे कहने लगे “मियाँ अल्लानूर ! तुम तो मियां, आज़ ख़ुदा के रूप में यहाँ आये और आपने मेरी मदद की !”

“अब तो मियां रशीद, आप समझ गए ना..? ख़ुदा अपने हर बन्दे की तक़लीफ़ों में उसकी मदद करता है ! यानी, इस ख़िलक़त में ख़ुदा ज़रूर है, और वह तक़लीफ़ों में अपने बन्दों मदद करता है ! अब तो मियां, आप मान गए ना, ख़ुदा ज़रूर है ? अब यह कभी मत कहना कि, ख़ुदा है, कहाँ ?


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