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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

जीवन घृत....

डा श्याम गुप्त

कौन से पल बन जायें ऋचाएं , कौन से पल शुचि मन्त्र बनें । हर पल को जीले रे मन! तू, क्या जाने कब द्वंद्व मिलें ॥ ..... कौन से पल..... हर पल प्रेम प्रीति रत रहकर, सफल करे नर, जीवन को। प्रीति मथानी से तू मथ ले, रे मन! अंतस के दधि को। जाने किस मधुरिम पल-छिन में, माखन तुझको मिल जाए॥ .......कौन से पल॥ जीवन उदधि है इक रत्नाकर, सत रूपी इक गागर कहिये। धर्म की डोरी, कर्म मथानी, भक्ति भाव नित मथते रहिये। स्वार्थ-द्वंद्व की मथनी तेरी, घोंघे -सीपी मिल जायेंगे। शुचि कर्मों की बने मथानी, रत्न तभी तो मिल पायेंगे। क्या जाने किस मधुरिम कृति से , जीवन का घृत मिल जाए॥ .... कौन से पल....

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