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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

ऐसा अपना साथ

डॉ. रंजना वर्मा

मावस की यह रात अंधेरी पंथ न सूझे साथी । ऐसा अपना साथ कि जैसे एक दिया दो बाती ।। नभ में तारे सिसक रहे हैं रजनी पति है खोया , धरती का कण आज सांत्वना ओस अश्रु में रोया । सोच रही भू आज किसे रत्नों की सौंपे थाती । ऐसा अपना साथ कि जैसे एक दिया दो बाती ।। कठिन समस्या अंधकार यह निगल न जाए निधि को , इसीलिए वसुधा क्या वंचित करने आई विधि को । वसु की धारा दीपशिखा बन फूली नहीं समाती । ऐसा अपना साथ कि जैसे एक दिया दो बाती ।। नीलम वातायन से नभ ने काली चादर ओढ़ी , अमिट लेख विधना का पढ़ने भागी नींद निगोड़ी दीपों की यह झिलमिल भी है मन को नहीं सुहाती । ऐसा अपना साथ कि जैसे एक दिया दो बाती ।। दुख सुख आंख मिचौली खेले मन यमुना के तीरे , साथ रहो तुम कट जाएगी मावस धीरे-धीरे । फिर से हमें दिखेंगी किरणें अपने पास बुलाती । ऐसा अपना साथ कि जैसे एक दिया दो बाती ।। एक दीप प्रिय अमर प्रेम का चौबारे पर बालो , अँजुरी भर फिर किरण नेह की जग की ओर उछालो । शायद कोई किरण सँभाले बुझती जाती बाती । ऐसा अपना साथ कि जैसे एक दिया दो बाती ।।

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