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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

गमे आशिक़ी ने सँभलना सिखाया

डी एम मिश्र

गमे आशिक़ी ने सँभलना सिखाया समंदर में गहरे उतरना सिखाया अकेले थे पहले बहुत खुश थे लेकिन तेरी आरज़ू़ ने तड़पना सिखाया बड़ी धूल थी बारहा रुख़ पे मेरे तेरी इक नज़र ने सँवरना सिखाया कभी मैंने ख़ारों की परवा नहीं की गुलों ने मुझे भी महकना सिखाया लगी आग दिल में तो ख़ामोश रहकर घटाओं ने मुझको बरसना सिखाया भरोसा मुझे अपने ईमान पर है मुझे ज़ुल्म से जिसने लड़ना सिखाया वो तुम हो मुझे जिसने हिम्मत अता की सितारों के आगे निकलना सिखाया

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