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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 71, अक्टूबर(द्वितीय), 2019

बेटी जैसा प्यार

डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कुलदीपक की सहचरी, घर का है आधार। बहुओं को भी दीजिए, बेटी जैसा प्यार।। -- बाबुल का घर छोड़कर, जब आती ससुराल। निष्ठा से परिवार तब, बहुएँ सहीं सम्भाल।। नहीं सुता से कम यहाँ, बहुओं का प्रतिदान। भेद-भाव को त्यागकर, उनको देना मान।। बहुओं से घर का चमन, होता है गुलजार। बहुओं को भी दीजिए, बेटी जैसा प्यार।। -- बहुएँ घर की स्वामिनी, हैं जगदम्बा-रूप। अपने को खुद ढालतीं, रिश्तों के अनुरूप।। सुन कर कड़वी बात भी, बहू न होती रुष्ट। रहती हर हालात में, शान्त और सन्तुष्ट।। बहुओं पर मत कीजिए, हिंसा-अत्याचार। बहुओं को भी दीजिए, बेटी जैसा प्यार।। -- हो जाते परिवार में, कभी-कभी मतभेद। मगर न रखना चाहिए, आपस में मनभेद।। नया जमाना आ गया, नये-नये हैं काज। बहुओं पर मत थोपना, रूढ़ी और रिवाज।। वट-पीपल के वृक्ष सा, रहना सदा उदार। बहुओं को भी दीजिए, बेटी जैसा प्यार।। -- रंग-रंग के सुमन हैं, लेकिन उपवन एक। फूलों से होता सदा, देवो का अभिषेक।। घर के बड़े बुजुर्ग हैं, देवताओं का रूप। सहते मौसम की वही, बरखा-सरदी-धूप।। हर उत्सव पर पर बाँटिए, बहुओं को उपहार। बहुओं को भी दीजिए, बेटी जैसा प्यार।। -- बहुओं के कारण बने, दादा-दादी लोग। वंशबेल का बिन बहू, बनता नहीं सुयोग।। पोते-पोती से हुआ, उपवन है गुलजार। कहलाता है चमन वो, जिसमें रहे बहार।। सास-ससुर के प्यार की, बहुओं को दरकार। बहुओं को भी दीजिए, बेटी जैसा प्यार।। --

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