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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018


गुलाब


नवीन कुमार भट्ट


             
लिए हाथ गुलाब राह ताकता रहा।
मैं इधर तो कभी उधर झाँकता रहा।।

वो आयेगी वायदा जो किया था,
गुलाब इम्तेहान का जबाब माँगता रहा।।

कब आयेगी वो जरा मुझे बता दो,
आंधेरी हुई शाम बस वह नापता रहा।।

खुशी के पंख जो गुलाब सजाये ,
उसकी गलियों को बस यूँ बाँचता रहा।।

क्या कमियां है मुझमें वो न आई,
बैठ के"नीर"बस यही बस जाँचता रहा।।

महकता गुलाब हाथों पे रखकर ,
उस राह पर बैठकर यहीं आँकता रहा।।
 

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