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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018



नज़ारा न छीनिये


गोपेश आर शुक्ला


           
निगाहों से हसीं नज़ारा न छीनिये 
गरीब से जीने का सहारा न छीनिये। 

हर सितम मंज़ूर पर बेबस दिल से  
आश का आखिरी सितारा न छीनिये।

हक़ है हुस्न को रूठने का लेकिन
हक़ मनाने का हमारा न छीनिये।

फिर डूब जाएंगे ग़मे-दरिया में हम
हाथों से दामन किनारा न छीनिये।

मेरी उम्मीदों के बुझ चले दीयों से
हसरतों का आखिरी शरारा न छीनिये।

मिला के नज़र दी है ज़िंदगी आपने
अब चुरा के नज़र दुबारा न छीनिये।
 

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