Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018



नीची जाति के ऊँचे लोग


राम प्रकाश सक्सेना (डॉ.)


मेरे बचपन में जाति-पाँति का जमकर बोलबाला था। हम ऊँची जाति के मुहल्ले में रहते थे। पीछे की ओर कुछ मजदूर रहते थे। मैंने एक-दो बार उधर जाने की कोशिश की, तो माँ ने डांट दिया, “उधर नीची जाति के लोग रहते हैं। उधर मत जाना।”

एक दिन मैंने प्रश्न किया, “माँ, छोटी जाति के लोग कौन होते हैं?”

“छोटा काम क्या होता है?” मैंने एक अन्य प्रश्न उछाल दिया। माँ खीझकर बोली, “भाग जा। मेरा दिमाग मत खा।”

एक रात एक चोर ने मेरे पिता के पेट में चाकू भोंक दिया। घर में हाहाकार मच गया। बड़ी जाति के लोग रिक्शा, तांगा लेने इधर उधर दौड़े। इतनी रात को तांगा-रिक्शा कहाँ मिलता?

घर में शोर शराबा रोना-पीटना अधिक हुआ, तो नीची जाति के लोग भी आ गए। उन्होने आते ही चारपाई समेत उठाकर मेरे पिता को अस्पताल पहुँचा दिया। तत्काल उनमें से एक ने अपना खून भी दे दिया। पिता बच गए।

एक बार मैंने माँ से पूछा, “माँ, अपने पीछे जो लोग रहते हैं, वे क्या नीच जाति के हैं?”

माँ निरुत्तरीत थी। फिर भी बच्चे की जिज्ञासा को यह कहकर शांत किया, “बेटा, अपने घर के पीछे छोटी जाति के, ऊँचे लोग रहते है।”

मैंने कहा, “अपने आस-पास क्या ऊँची जाति के लोग रहते हैं।”

मान पर उत्तर देते न बना तो पिता ने ये पंक्तियाँ सुना दीं-

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर
पंछी को छाया नहीं, फल लागत अति दूर।


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें