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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018



रोग-प्रतिरोधक


राजीव कुमार


नौकरी की खोज में महानगर आए विनय को गंदी बस्तियों में ही रहना पॉकेट के हिसाब से सही लगा और मजबूरी भी थी।

उसी बस्ती में रहने वाले और वायरल बीमारियों से ग्रसित दोस्त ने जब उसकी निरोगी काया के लिए बधाई दी तो विनय फूला नहीं समाया।

विनोद को याद आया कि खुद बीमार रहते हुए भी उसके पिता ने ड्राई फ्रूट्स देते हुए कहते थे कि ‘‘तुम्हारे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी और बरकरार रहेगी।’’

विनय के शरीर में दौड़ रही रोग-प्रतिरोधक शक्ति तो उसका भरपूर साथ दे रही थी, लेकिन एक समय ऐसा आया कि जब उसको मानसिक बीमारियां सताने लगीं, जैसे-असफलता का अवसाद मन-मस्तिष्क में घर कर लेना, लोगों की निराशावादी तर्क की चपेट में आ जाना, सफल न होने पर पश्चात्ताप के गर्त में धंसते चले जाना...इत्यादि।

विनय को स्मरण हो आया कि मां गीता पाठ करते वक्त डांट-डपटकर अपने पास बिठाती। गीता की बहुत सारी बात याद थीं और भूली-बिसरी बातों को खुद गीता पाठ कर मानसिक बीमारियों से खुद को उबार लिया और सफल हुआ।

आज विनय के माता-पिता दोनों इस संसार में नहीं हैं लेकिन उनके द्वारा दिया गया रोग-प्रतिरोधक उसको नई शक्ति और नया विचार दे रहा है। सोच से लेकर सफलता तक के सफर में गीता पाठ काम आएगी।


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