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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018



घर से घाट तक


महेश चंद्र द्विवेदी


वह अभी किशोरी थी. किशोरावस्था में ही उसके बदन में वांछित उभार आ गये थे और नेत्रों में नवयौवन की मस्ती छाने लगी थी. बोझ से लदे होने के कारण उसके चलने पर वे उभार और उत्तेजक हो रहे थे. प्रतिदिन बोझ लादने का वही काम करने से ऊबी हुई उसकी मां उसके पीछे धीरे धीरे चल रही थी. मां ऊबी होने के अतिरिक्त यह देखकर दुखी भी थी कि आज उसकी पुत्री लंगड़ा कर चल रही थी. यद्यपि किशोरी अपनी मस्ती में अपनी पीड़ा को भूली हुई थी, परंतु मां का हृदय उसके दुख से द्रवित हो रहा था. अकस्मात किशोरी का पैर एक पत्थर पर पड़ जाने पर वह कराह उठी, तो मां आगे बढ़कर सांत्वना देने हेतु पूछने लगी,

“क्या बहुत दर्द हो रहा है?”

किशोरी ने मां की बात का सीधा उत्तर न देकर प्रतिप्रश्न किया,

“मां, आज फिर उसने बेबात डंडा मार दिया. मैने क्या गलती की थी?”

“तुमने पीठ हिलाकर उस पर रखे कपड़े गिरा दिये थे.”

“मैं क्या करती उस निर्दयी ने गंदे खुरदुरे कपड़े पीठ पर रख दिये थे, जिससे पीठ में ज़ोर की खुजली पड़ने लगी थी.”- बेटी ने प्रतिवाद किया.

मां ने समझाने के स्वर में कहा, “ऐसे नहीं बोलते. वह हमारे मालिक हैं.”

किशोरी भड़क गई, “कैसा मालिक? खाने को रूखा-सूखा और आधा पेट, और लादने को दुगुना? ”

“फिर भी उनकी वजह से हमें बिला नागा खाने को तो मिलता है.”

“पेट तो हमारी वजह से उसका पलता है. वह अपनी बेटी को तो कुछ नहीं कहता है, जिसने तमाम कपड़ों पर रेत फैला दी थी, जिससे मेरी पीठ में खुजली हुई थी.”

मां हथियार डालते हुए संसार का अविवादित सत्य बोल पड़ी, “बेटी! निर्दयी तो सम्पूर्ण प्रकृति है,जो किसी को लद्दू गदहा बनाती है और किसी को उसकी पीठ पर बोझ लादने के लिये आदमी.”

फिर अपनी निरीहता पर दोनो चुप हो गईं - उनकी निरीहता का चिर-साक्षी धोबीघाट सामने था.


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