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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018


फिर भले मत करजे तू सराद


राजेश भंडारी “बाबु”


                        
कितरा भी हो तम लखपति
कितरा भी हो तम कामपति
बुजुर्गो का साथे दो पल गुजारनो भूलो मती
रोज पेला लो उनको आशीर्वाद ,
फिर भले मत करजे तू  सराद |
 
नि चिये उनके खीर पुडी हलवा ,
वि तो चावे तमसे प्रेम से मलवा
वि चावे दो मीठा बोल सुनवा ,
उनका आशीर्वाद ज हे तामारा लिए प्रसाद
फिर भले मत करजे तू  सराद |
 
मरया बाद को कई आलम
कुन का जावे कीके मालम
बामन कागला तो जीमता रेगा
पण थारी आत्मा पे बोझ रेगा
मत कर उनसे कोई वाद विवाद
फिर भले मत करजे तू सराद |
 
याद आवेगी वि दर्द भरी सिसकती आवाजे
वि तड़फति आखा और कराहती आवाजे
बेटा बेटा करती माँ और बापू की परवाजे
कर सेवा इनकी क्योकि आज तू हे आबाद ,
करले सदुपयोग समय को मत कर इके बर्बाद
फिर भले मत करजो  तू सराद |

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