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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018


विवशता


डॉ. प्रणव भारती


                     
सम्मोहित करते मन की 
बीमार यंत्रणाएं 
दूध में जल के मिश्रण सी 
बहलाती,फुसलाती 
बनाती मूर्ख 
प्रतिदिन 
रचाती हैं 
एक भ्रमित संसार ----
डूबते-उतराते मनोभावों को 
दंशों से लहूलुहान 
फिर-फिरकर 
आ बैठते हैं हम 
उसी डाल पर 
जिसको काटते हैं  
स्वयं उस पर बैठकर ----
प्रदर्शित करते हैं 
पीड़ा अपनी 
डूबते-उतरते संवेगों को 
भर लेते हैं ,एक छलनी में 
और फिर 
उसमें से सब-कुछ छन जाने की 
शिकायतों के पोटले 
ढोते हुए 
पूरी उम्र गुज़ार देने को 
विवश हो जाते हैं ------

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