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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018


सखा कृष्ण


लवनीत मिश्रा


            
चल माधव आ संग मेरे,
सखा बन खेलू संग,
दुनिया तोहे पूजित, 
पर मै ना जानू ढंग,
लुका छुपी खेल रहा तू,
छुपकर मोसे बैठा, 
मै भी तोहे खोजू निस दिन,
कहाँ है छुपकर बैठा,
हठ ना कर अब कृष्णा मोसे,
मै ना मानू हार,
तू है जग का पालनहारी,
तो मै भी तेरा यार,
दिखा जरा बंसी तू अपनी,
मोहे दे सिखलाए, 
जब जब तेरी याद सताए,
तो बंसी लू बजाए, 
देख मै लाया पुष्प सुनहरे,
तेरा करू श्रृंगार, 
तू भी क्या याद करेगा, 
मुझ जैसा पाकर यार,
अब कान्हा जा घर जल्दी,
माता रही पुकार,
नित मिलना जब समय मिले,
राह तकू मै कृष्ण मुरार।
 

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