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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018



वक्त का निमंत्रण


कुंदन कुमार


           
वक्त की हर शै मुसाफिर 
दे रहा तुमको निमंत्रण 

बांह खोले कर रहा है 
आज वो तेरा अभिनन्दन 
आ मेरी आगोश में आ 
ज्ञात कर अज्ञात हर क्षण 
वक्त की हर शै मुसाफिर 
दे रहा तुमको निमंत्रण

देख वो है दूर कितना 
पर नहीं तेरे भाव जितना 
चल राही तू पग बढ़ा अब 
पोंछ ले हर स्वेद का कण 
वक्त की हर शै मुसाफिर 
दे रहा तुमको निमंत्रण

तोड़ दे उन बेड़ियों को 
जो खींचे तुमको निरंतर 
है परम कर्त्तव्य तेरा 
मलय न हो उम्मीद का मन 
वक्त की हर शै मुसाफिर 
दे रहा तुमको निमंत्रण

हो उदय वो स्वप्न ह्रदय में 
सामर्थ्य वो नभ को चूमने में 
कृतघ्नता कृतज्ञ का हो 
करे काल तुम्हे खुद का समर्पण 
वक्त की हर शै मुसाफिर 
दे रहा तुमको निमंत्रण

हो न विरह से तू कलुषित 
न ज्वलन से मन ये कल्पित 
कल्पना का है गगन ये 
उम्मीद का होता अभिनन्दन 
वक्त की हर शै मुसाफिर 
दे रहा तुमको निमंत्रण

अमा की वो विभा या ढलती उषा 
हो वज्रपात या चुभती निशा 
रुक न अभी बस वो है मंजिल 
चल चला रख न ये विचलन 
वक्त की हर शै मुसाफिर 
दे रहा तुमको निमंत्रण

है दमक तेरे मुख पे कैसी 
छू लिया जो आसमां तू 
तू रुक नहीं निष्प्राण नहीं 
चल करें शत जग का विचरण 
वक्त की हर शै मुसाफिर 
दे रहा तुमको निमंत्रण 
 

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