Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018



बापू हुए उदास


कवि जसवंत लाल खटीक


           
काली अंधयारी रात थी वो ,
कुछ हल्का सा आभास हुआ ।
सफेद परछाई , हाथ में लाठी
व अपना-सा अहसास हुआ ।।

मुझसे एक प्रश्न किया कि ,
"जसवंत" कैसा है भारत देश ।
क्या-क्या हो रहा मुझे बता ,
क्यों लोग बस रहे है विदेश ।।

थोड़ी देर सोचा मैंने और ,
थोड़ा गहन विचार किया ।
बापू को पास बिठाया मैने ,
उनके प्रश्न का जवाब दिया ।।

सुनो बापू !
अब मैं देश के हालात बताऊँ ,
आधुनिक भारत की सैर कराऊँ ।
आपने अहिंसा का पाठ पढ़ाया ,
मैं घर से निकलने पर घबराऊँ ।।

पर आज ये भारत का नोट ,
देश की धज्जियां उड़ा रहा ।
तेरे दिए सब कायदे-कानून ,
चंद-चुटकियों में तुड़ा  रहा ।।

अहिंसा बदल जाती हिंसा में ,
चन्द नोट में आदमी बिक जाते ।
सच भी झूठ बन जाता पल में ,
जब-जब कड़क नोट दिख जाते ।।

भ्रष्टाचार अब खूब फैल रहा ,
तेरे इन्हीं नोटों की ताकत से ।
जगह-जगह पर ईमान बिके है,
कुछ चन्द टुकड़ों की चाहत से ।।

खुलेआम जिश्म बिक रहे ,
बेचने वाले खून भी बेच रहे ।
हद तो बहुत हो गयी बापू  ,
गरीब अपने घरबार बेच रहे ।।

चारों तरफ खूब पानी पर ,
बोतल में भर पानी बेच रहे ।
नोट की ही ताकत है बापू ,
अपना बहुमूल्य वोट बेच रहे ।।

पैसों के लिए हत्या कर देते ,
कोई अपनी कोख बेच रहे ।
और क्या-क्या बताऊँ बापू ,
दहेज के लिये बेटी बेच रहे ।।

बापू तुझको क्या कहूं अब ,
सैनिक रोज गोली खा रहे ।
नोट के चक्कर में नेताजी ,
जनता को पागल बना रहे ।।

फाँसी पर लटक रहा किसान ,
क्योंकि नोट पसीने से है भारी ।
जीवन के पग-पग पर रुपया , 
हम सब लोग है तेरे आभारी ।।

करोड़ों अरबों खर्च हो रहे ,
बच्चों की महंगी शिक्षा में ।
फिर भी सड़कों पर घूम रहे ,
लाखों बच्चे लिप्त भिक्षा में ।।

क्या सोचा और क्या हो गया ,
बापूजी बहुत हो गए उदास ।
"जसवंत" देश हित काम करो ,
मैं करता हूं अब तुमसे आस ।।
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें