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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018



पूजा और पुजारी


देवेन्द्र कुमार राय


           
दायें सरस्वती वाम पक्ष में भारत माता
मध्य ओम लिए चलते है, 
हम समाज के अर्थ मुकुट को
इसी छाया से छलते है।।
पूजा बना है आज मदारी
रंग विरंग फूलों के संग, 
कातर दृष्टि से देख रहा हूँ
इस पूजा का नया ढंग।।
आया पुजारी जोर गरजता
माचिस की डिबिया कहां है, 
शिष्य सिकुड़ता धीरे से बोला
महात्मन वह तत्व सामने पडा़ है।।
शिष्य फिर हिम्मत जुटाया
नतमस्तक हो सामने आया, 
हृदय विचार ने दस्तक दिया
कोमल शब्दों में प्रश्न सजाया।।
पूछा बाबा क्या माचिस ही पूजा है
या सरस्वती का माचिस से दोस्ताना  है, 
भक्ति भाव छोड़ हमे क्या 
माचिस को ही अपनाना है? 
आग बबूला हुआ पुजारी
चेहरा बन गया ऐटम बम, 
बोला, सवाल करते हो, बहुत बनते हो
नहीं समझते हो हमारे रहमो करम।।
पूजा का यह कैसा रुप
शिष्य समझ नहीं पाता है, 
क्या जबरन पूजा होती है
इसी विभ्रम में पड़ जाता है।।
शिष्य हृदय से काँप जाता है
पुजारी की मन:स्थिति भाँप जाता है, 
सोचा पूजा हेतु पुजारी चिल्लाएगा
अबकी फूल के लिए फाँसी चढा़एगा।।
दोपहर की तीखी धूप से
जैसे कुसुम कुम्हलाता है, 
वैसे विचार झुलस गया तब
हृदय बैकुण्ठ सहलाता है।।
भक्ति भाव अब बना दिखावा
छलवा हो गया सारा जमाना, 
हरिपद प्रेम का भाव गया
'राय' गया सब अमृत खजाना ।।
 

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