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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018



बेटियाँ


बृज राज किशोर 'राहगीर'


           
ख़ूबसूरत  ख़्वाब  जैसी बेटियाँ।
मोतियों की आब जैसी बेटियाँ।
प्यार से  थामे हुए  परिवार को,
क़ीमती  महराब  जैसी बेटियाँ।

ज़िन्दगी के गीत जैसी बेटियाँ।
दिलनशीं संगीत जैसी बेटियाँ।
बेवफ़ाई   से   भरे  संसार   में,
एक सच्चे मीत  जैसी बेटियाँ।

भोर में खिलते कमल सी बेटियाँ।
मीर की  उम्दा ग़ज़ल सी बेटियाँ।
ज़िन्दगी  हो जब निराशाओं भरी,
जादुओं वाले  अमल सी बेटियाँ।

फूल वाली क्यारियों सी बेटियाँ।
महकती फुलवारियों सी बेटियाँ।
मन्दिरों की घन्टियों  की गूँज सी,
उर्स की क़व्वालियों  सी बेटियाँ।

मोहिनी  मुस्कान  वाली  बेटियाँ।
माँ पिता की जान वाली बेटियाँ।
आइना  हैं आपकी  तक़दीर का,
बरकतों की खान वाली बेटियाँ।
 

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