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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018


सज़ा दीजिये


महाराजा जीलानी


            
दिल दुखाया है गर तो सज़ा दीजिये,
हाँ मगर हाले दिल भी पता कीजिये!!

कैसे ठहरा दिया मुजरिम मुझे आपने,
बेगुनाही का सबब भी पता कीजिये!!

जागता रह गया जाने क्यों रात भर,
क्या वजह थी कभी तो पता कीजिये!!

ख़्वाहिशें अब जनाज़े में तब्दील हैं,
आप ही आके इसको जला दीजिये..!!

बेमुरव्वत है ज़माना तो हम क्या करें,
कम से कम आप न दिल्लगी कीजिये !!

छूट जाएगा  सब कुछ  यहाँ एक दिन,
बैठिए पास मेरे कुछ गुफ़्तुगू कीजिये!!
 

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