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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018


दोहे
"पितृपक्ष में कीजिए, वन्दन-पूजा-जाप"


डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”


                        
श्रद्धा से ही कीजिए, निज पुरुखों को याद।
श्रद्धा ही तो श्राद्ध की, होती है बुनियाद।।
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आदिकाल से चल रही, जग में जग की रीत। वर्तमान ही बाद में, होता सदा अतीत।।
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जीवन आता है नहीं, जब जाता है रूठ। जर्जर सूखे पेड़ को, सब कहते हैं ठूठ।।
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जग में आवागमन का, चलता रहता चक्र। अन्तरिक्ष में ग्रहों की, गति होती है वक्र।।
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वंशबेल चलती रहे, ऐसा वर दो नाथ। पितरों का तर्पण करो, भक्ति-भाव के साथ।।
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जिनके पुण्य-प्रताप से, रिद्धि-सिद्धि का वास। उनका कभी न कीजिए, जीवन में उपहास।।
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जीवित माता-पिता को, मत देना सन्ताप। पितृपक्ष में कीजिए, वन्दन-पूजा-जाप।।
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अच्छे कामों को करो, सुधरेगा परलोक। नेकी के ही कर्म से, फैलेगा आलोक।।
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बुरा कभी मत सोचिए, करना मत दुष्कर्म। सेवा और सहायता, जीवन के हैं मर्म।।
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