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वर्ष: 3, अंक 47, अक्टूबर(द्वितीय) , 2018


मृत्यु एक मछुआरा
"DEATH A FISHERMAN"


मूल कवि -बेंजामिन फ्रैंकलिन”
काव्यानुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”


                        
दुनिया एक सरोवर है,
और मृत्यु इक मछुआरा है!
हम मछली हैं अवश-विवश सी,
हमें जाल ने मारा है!!

मछुआरे को हम जीवों पर 
कभी दया नही आती है!
हमें पकड़कर खा जाने को,
मौत नही घबराती है!!

तालाबों में झूम रहा है
जाल मृत्यु बन घूम रहा है!
मछुआरा चुन-चुन कर सबको
बेदर्दी से भून रहा है!!

आये हैं तो जाना होगा
मृत्यु अवश्यम्भावी है!
इक दिन तो फँसना ही होगा,
जाल नही सद्-भावी है!!

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