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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

माला में खुशबू आज भी है ...

अनुपमा तिवाड़ी

लगभग 17 वर्ष पहले राजस्थान के विराट नगर में मैं, एक संस्था के पूर्व प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम में प्रोग्राम ऑफिसर के रूप में कार्यरत थी. लगभग 2 वर्ष काम करने के बाद जब मैं वहां से कार्यमुक्त हुई तो सभी शिक्षिकाओं ने मेरी विदाई के लिए कुछ – कुछ पैसे इक्कठे किए ( जबकि उन्हें बहुत कम वेतन मिलता था ) और फिर विदाई वाले दिन उन्होंने ऑफिस में अपने हाथ से दाल, बाटी, चूरमा हम सब के लिए बनाया. विदा के वक्त मुझे रुपयों की माला पहनाई और मेरे दोनों बच्चों को फूलों की माला.

वक्त गुज़रता गया. एक बार कहीं जाते समय मुझे कुछ रुपयों की ज़रुरत पड़ी तो मैंने मजबूरी में उस माला में से स्टेपलर की पिन बहुत सावधानी से हठाते हुए उन रूपयों को निकाला. मेरी इच्छा तो ये थी कि ये रूपये खर्च नहीं हों और सच में वो खर्च नहीं हुए तो घर आ कर मैंने उन रुपयों को दुबारा उस माला में स्टेपल कर के लगा दिया. वह मात्र रुपयों की माला नहीं उन शिक्षिकाओं के दिए प्यार और सम्मान की खुशबू थी जो आज भी उसमें मौजूद है.


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