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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

प्यार के नग़्मे

ज़हीर अली सिद्दीक़ी

तेरे रूठने से मोहब्बत में चार चांद लगा बाग में बदला मौसम लाज़बाब लगा।। भौरा हूँ काटों से लड़कर पहुंचा तुम तक घायल परिंदा फिर भी आशियाने का आदी।। इसमें क़ुदरत के दस्तूर का कसूर है कैसा कली तक पहुंचना कांटो से गुज़रने जैसा।। कली पर खूँ भौरे का टपकना ही तो सिद्दत है ए आशिक! ऐसी हक़ीकत ही सच्ची इबादत है।। कली को फूल बनने तक छुपा कर रखा कांटा कितना भी ज़ालिम हिफाज़त किया।। कांटे से घायल हुआ, ज़ख्म से वाकिब हुआ जख़्मी होकर भी पाने से वाकिब हुआ।। पंख तोड़ दिए तूफ़ां! हौसला तोड़ नही सकता पंखों से महज उड़ान जुड़ा, असल तो न रुकने से है।।

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