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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

अहसास

सौरभ कुमार ठाकुर

मोहब्बत का अहसास होता ही रह गया, पता नही मैं कब तक सोता ही रह गया । मोहब्बत किया था मैंने उससे एक दफा, पर कहने की हिम्मत जुटाता ही रह गया । दिल में तो मेरे काफी ख्याल थे उसके लिए, पर आज या कल कहूँ सोचता ही रह गया । जगाना था प्यार भरा भाव उसके दिल में, मैं तो उसके दिल में विष बोता ही रह गया । है मोहब्बत की उस राह पर खड़ा, सौरभ, अहसास मोहब्बत का करता ही रह गया । कभी जीता था मैं उस माशुका के प्यार में, उसी के प्यार में आज मैं रोता ही रह गया । पाना था उसकी मोहब्बत को मुझे किसी पल, प्रतिदिन मोहब्बत उसकी खोता ही रह गया । अहसासों में उसे ढूँढ़ता फिर रहा हर गली, ना चाहते हुए भी हर-पल मरता ही रह गया ।

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