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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

कोई लम्हा भी ऐसा हो

सलिल सरोज

कोई रोज़ सही कोई लम्हा भी ऐसा हो बादलों में भीगा हुआ सरज़मीं जैसा हो पानी नाचे झूमके लहलहाते फसलों पे कैसे पागल होते हैं, फिर शमा वैसा हो पेड़ों के बदन पर हों सोने की बालियाँ पगडंडियों पर बरसता रूपया पैसा हो नदी गाए गीत कोई, झरने नाचे ताल पे सोचो फिर ये दिन और ये रात कैसा हो

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