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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

खुद को जीना भी जरूरी है

सलिल सरोज

ये चाक जिगर को सीना भी जरूरी है कुछ रोज़ खुद को जीना भी जरूरी है ज़िंदगी रोज़ ही नए कायदे सिखाती है बेकायदे होके कभी पीना भी जरूरी है सब यूँ ही दरिया पार कर जाएँगे क्या सबक को डूबता सफीना भी जरूरी है जिस्म सिमट के पूरा ठंडा न पड़ जाए साल में जून का महीना भी जरूरी है सिर्फ जान पहचान ही काफी नहीं होती नाम कमाना है, तो पसीना भी जरूरी है

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