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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

हम नही यूं मलाल रखतें हैं

प्रीती श्री वास्तव

हम नही यूं मलाल रखतें हैं। दिल को बिल्कुल बहाल रखतें हैं।। करतें यारों मियां है मनमानी। इसलिये हम तो भाल रखतें हैं।। गम हो कितने नही फिक्र हमको। हम तो बिंदास चाल रखतें है।। दे न कोई जवाब खंजर से। तीर हम बेमिसाल रखतें हैं।। हमसे करना नही होशियारी। हम भी दिल में उबाल रखतें है।। हम नही बेखबर हैं दुनिया से। हम सजा सबके थाल रखतें हैं।। की अगर हमसे तुमने दोस्ती तो। हम भी कायम मिसाल रखतें हैं।। पीठ पर वार सुनो करना मत। बचने को हम भी ढाल रखतें हैं।।

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