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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

जिन्दगी

नीतू शर्मा

बिखरे जज्बातों की झड़ी जिन्दगी, हर तरफ उलझनों से भरी जिन्दगी । भोर के तारे सी आसमां में सजी, पल गुजरते ही ओझल हुई जिन्दगी । चाहतो के लिबासों में लिपटी मिली, ढूंढने जब गई खोई सी जिन्दगी । आँखों में आँसू थे दिल मे तन्हाईयां, भीड़ में भी अकेली मिली जिन्दगी । दौरे रूसवाईयों से वो घायल हुई, अनकही दास्तां बन गई जिन्दगी । तेज आँधी में दीपक सी जलती हुई, फड़फड़ाती हुई लौ सी जिन्दगी । दर्दे खामोशियों को समझ ना सके, अनबुझी सी पहेली बनी जिन्दगी । टूटे ख्वाबों की गठरी समेटे हुए, एक अधूरी कहानी बनी जिन्दगी । चाहतो के लिबासों में लिपटी मिली, ढूंढने जब गई खोई सी जिन्दगी ।

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