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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

किधर गया है आदमी

नरेन्द्र श्रीवास्तव

यहां अभी जो था खड़ा, वो किधर गया है आदमी। अब तक जाना था सुधर, बिगड़ गया है आदमी।। कदर न की सयानों की ये अंजाम इसीलिये हुआ। तिनके की तरह टूट के, बिखर गया है आदमी।। निशां मील के पत्थरों के,जो लगे थे राह में। गिरा दिये, मिटा दिये तो बिछड़ गया है आदमी।। मौका मिला तो नोंचने में, कसर कोई छोड़ी नहीं। इतने बड़े जहान में ,सिकुड़ गया है आदमी।। चकाचौंध नोट की यूँ कमजोर है कर गई। बह गया है पसीना और निचुड़ गया है आदमी।। अपने-अपने में लगे हैं, समेटने जितना बने। आइने में देख खुद को सिहर गया है आदमी।।

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