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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

दर्द मिलते रहे

डॉ० अनिल चड्डा

दर्द मिलते रहे, अश्क बहते रहे, हम जख्मों को फिर भी सहते रहे। कौन अपना यहाँ, और पराया है कौन, बस दीवारों से दिल की हम कहते रहे। ये वीराने कभी तो गुलिस्ताँ से थे, बीती यादों के संग हम थे रहते रहे। मेरी अच्छाइयों को वो गर बुरा भी कहें, सिर झुका हर सजा हम तो लेते रहे। बेकरारी बहुत थी, हमसे न काबू हुई, दूर हमसे हमेशा जाने क्यों वो हटते रहे।

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