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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी की चुनौतियाँ

डॉ० छोटे लाल गुप्ता

भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा हम अपनी भावनाओं और विचारों को किसी दूसरे के समक्ष अभिव्यक्त करते हैं और दूसरे की भावनाओं और विचारों को समझते हैं। इससे अलग भाषा की कोई और परिभाषा हो ही नहीं सकती। भाषा का संबंध मनुष्य और समाज से है। भाषा कोई व्यक्तिगत्य विशेष समूहगत् सम्पत्ति नहींेे बल्कि वह एक सामाजिक निधि है। इसलिए सामाजिक सरोकारों से परे कोई भाषा हो ही नहीं सकती। किसी भी देश में राष्ट्र भाषा का सम्मान उस भाषा को ही प्राप्त होता है जो देश विशेष में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाती है। निश्चित तौर पर भारत देश का एक बहुत बड़ा जनमानस हिन्दी भाषा से परिचित है। इसलिए यह प्रस्तावित किया गया कि भारत में राष्ट्रभाषा का अधिकारी होने का सम्मान हिन्दी भाषा को प्रदान दिया जाए। जैसे ही किसी को कोई भी अधिकार प्रदान किया जाता है। कर्तव्य स्वयं ही निर्दिष्ट हो जाते हैं। और कत्र्तव्य पुनः अधिकारों का सृजन करते हैं। अतः इन दोनों का एक दूसरे से पूरक संबंध है। अधिकार कत्र्तव्यों के बगैर अधूरे होते हैं और कत्र्तव्य अधिकार के बगैर। इसे एक छोटे से उदाहरण के साथ समझना उचित होगा। जैसे ही किसी भी दम्पत्ति को माता-पिता बनने का अधिकार प्राप्त होता है वैसे ही उस दम्पत्ति के कत्र्तव्य भी स्वयं ही निर्दिष्ट हो जाते हैं। उस नए बच्चे के प्रति माता तथा पिता दोनों के अपने-अपने उत्तरदायित्व होते हैं जिन्हें वे किसी के कहने पर नहीं। स्वयं की शर्तों पर नूरी नैतिकता के साथ वहन करते हैं। जैसे संस्कार वे रोपते हैं। बच्चा उसकी प्रतिक्रिया वैसे ही देता है। बिल्कुल इसी तरह यही समीकरण ज्ञान के क्षेत्र पर भी लागू होता है।

किसी भी भाषा के राष्ट्रभाषा के रूप में चिन्हित होते ही उसके दायित्वों में वृद्धि हो जाती है। अब यह भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं रह जाती बल्कि वह समूचे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व विश्व के समक्ष करती है। कभी भी भाषा का संबंध केवल साहित्य से नहीं होता। साहित्य तो भाषा का एक पक्ष मात्र है। साहित्य समाज के समक्ष नई-नई चुनौतियों को लेकर खड़ा होता है। समाज को मानवता के दृष्टिकोण से चिंतन मनन करने को बाध्य करता है। जबकि भाषा का कार्य क्षेत्र बहुत विशाल होता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा को सदैव चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जीवन को संचालित करने के लिए अनुभव और ज्ञान के संतुलन की आवश्यकता होती है। और अनुभव तथा ज्ञान नामक ये दोनों ही पक्ष अपने विकास के लिए भाषा की अतुलनीय समृद्धि की माँग करते हैं।

आजादी के बाद न जाने कैसी हवा चली कि हिन्दी अंग्रेजी की साजिश का शिकार बन गई। आश्चर्य तो तब होता है कि हिन्दी का विरोध और अंगे्रजी का समर्थन अपने ही देशवासी कर रहे हैं और वह भी अंग्रेजों के जाने के पश्चात्। यह कैसी मानसिकता है? धिक्कार है इस गुलाम मानसिकता को! हमारे यहाँ सरकार की नीतियाँ स्पष्ट नहीं हैं। इसके लिए हम स्वयं दोषी हैं। वास्तव में हिन्दी बहुत ही मनोवैज्ञानिक भाषा है, जिसे बेझिझक अपना लेना चाहिए। चाहिए प्रबल इच्छाशक्ति। विडंबना इस बात की है कि आजादी के साठ वर्षोें के पश्चात् भी आज इस देश की जनता अंगे्रजी प्रभाव की मानसिकता से ग्रसित है। यदि हम प्रतिदिन हिन्दी का ही प्रयोग करेंगे तो निश्चित ही हमारी विदेशी मानसिकता मिट जायेगी।

विदेशी नेता भारतीयों से हिन्दी में बात करना चाहते हैं, लेकिन भारतीय नेता व अधिकारी हमेशा उनसे अंगे्रजी में बात करना पसंद करते हैं। वास्तव में इससे बड़ी लज्जा और क्या हो सकती है? इस गुलाम मानसिकता का प्रभाव हिन्दी भाषी क्षेत्रों में कुछ अधिक ही पड़ा है। यही कारण है कि वे अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए मम्मी, डैडी, अंटी, अंकल आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं। हिन्दी भाषी पढ़े-लिखे बाबू लोग अपने निजी कार्योें में भी हिन्दी भाषा का प्रयोग करने में शर्म महसूस करते हैं। यह देश के हित में नहीं है।

वैश्वीकरण के इस युग में देश के कुछ लोग यह मानते है कि अंगे्रजी के बिना हमारा काम चलेगा ही नहीं और हमारी उन्नति होगी ही नहीं। उन्हें गंभीरता से सोचना होगा कि क्या फ्रांस और जापान जैसे राष्ट्र कभी अपनी भाषाओं की उपेक्षा कर, अंगे्रजी को अपनाते हैै? क्या रूस तथा चीन में अंगे्रजी का प्रभाव बढ़ा? तो फिर भारत के ये अंगे्रजों के मानसपुत्र अंगे्रजी के पीछे क्यों पागल हो रहे हैं? लगता है, ये लोग स्वाभिमान शून्य हो गये हैं। इनकी दास मनोवृत्ति अभी मिटी नहीं है।

यदि हम भारतीय भाषाओं की उपेक्षा करते रहेंगे और अंग्रेजी के पिछलग्गू बनते जायेंगे, तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब भारतीय भाषाओं का अस्तित्व ही खतरें में पड़ जायेगा। देशवासियों को सोचना होगा कि भारतीय भाषाओं में राष्ट्रभाषा हिन्दी का भी समावेश है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी इत्यादि का भी अधिकाधिक प्रयोग करें। अंगे्रजों की सदा यही कूटनीति रही कि भारतीय कला, साहित्य, संस्कृति, धर्म आदि नष्ट हो जाये। इसलिये उन्होंने अंगे्रजी भाषा को ब्रह्मास्त्र के रूप में उपयोग किया। यद्यपि महात्मा गाँधी, सेठ गोविंददास, पुरूषोत्तमदास टण्डन जैसे कई देशभक्त मनीषी, अंगे्रजों की इस दुर्नीति को जान चुके थे; तथापि कुछ स्वार्थी तत्वों ने गाँधी जी की बात नहीं मानी। परिणामस्वरूप आज भारत भाषागत समस्याओं से जूझ रहा है।

अंगे्रजी जानना या सीखना कोई बुरा नहीं है, किन्तु इस बहाने राष्ट्रभाषा हिन्दी का पद छीनना, भारतीय भाषाओं की उपेक्षा करना कदापि उचित नहीं होगा। अंगे्रजी के बहाने विदेशी संस्कृति को अपनाना किसी भी हालत में स्वीकार नहीं होगा। क्योंकि यह तो गुलामी मानसिकता ही होगी। पराई संस्कृति को अपनाना देश के लिए घातक है। आजादी से पूर्व जो स्वाभिमान की भावना थी, जो देशभक्ति की ज्वाला हृदय में धधकती थी, वही राष्ट्रीय भावना आज सख्त जरूरी है। स्वभाषा प्रेम भी उतना ही प्रबल होना चाहिए, जितनी स्वदेश भक्ति। राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्र के विधान से कोई कम नहीं है राष्ट्रभाषा हिन्दी।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आज भारतीय बाजार में अपनी पैठ जमाने के लिए हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं का सहारा ले रही हैं और इधर हमारे ही देश में कई संस्थान ऐसे हैं, जो अंगे्रजी में ही अपना व्यवहार करते हैं। हिन्दी को गरीब तबके की भाषा मानते हैं। क्या यह उनकी गुलाम मानसिकता नहीं है? यह सही है कि हम अंगे्रजी को पूर्णरूपेण छोड़ नहीं रहे हैं, परन्तु इसका मतलब कदापि यह तो नहीं हो सकता कि हम हिन्दी की उपेक्षा करें। यह मानसिकता जानी चाहिए, अन्यथा देश की प्रगति नहीं होगी। गाँधी जी ने तथा तत्कालीन देशभक्तों ने देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ दिया था। वैसे ही हमें चाहिए कि हम गुलामी मानसिकता को तोड़ देने का संकल्प करें। हमें विश्वास है कि एक दिन हिन्दी को उसका योग्य स्थान जरूर मिलेगा। उसकी पुनप्र्रतिष्ठा अवश्य होगी।


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