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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

अनुत्तरित प्रश्न

शुचि 'भवि'

"आशीष कहाँ जा रहे हो? कब आओगे? यदि बाज़ार तक जा रहे हो तो आज गणपति विसर्जन है, मेरे लिए भी प्रसाद ले आना, पूरे 9 दिन आरती में गई थी, मगर आज ही इस बुख़ार को भी आना था।" "हाँ दादी, उस तरफ़ गया तो ज़रूर ले आऊँगा।" " माँ, जा रहा हूँ, अभी आता हूँ शलभ के घर से नोट्स लेकर", कहते हुए आशीष ने बाइक स्टार्ट कर दी थी।

शलभ के घर तक का रास्ता दूर तो नहीं मगर भीड़ भरे बाज़ार से होकर जाता था। बी.कॉम द्वितीय वर्ष का एक होनहार छात्र है आशीष और वैसा ही है उसका लंगोटिया यार शलभ भी । आशीष और शलभ एक साथ ही खेलते पढ़ते-लड़ते बड़े हुए हैं और आज भी उनकी दोस्ती एक मिसाल है।

पढ़ाई करते, बातें करते, आशीष को समय का ध्यान ही नहीं रहा कि कब 2 घंटे बीत गए।" यार आठ बज गया है, चल गणपति आरती हो गई होगी, विसर्जन है न आज और दादी को बुख़ार भी है, इसलिए उन्होंने कहा है प्रसाद लेकर आना।"

आशीष और शलभ जब पंडाल तक पहुँचे तो पंडाल ख़ाली था। आशीष ने गाड़ी उसी दिशा में मोड़ दी जिस दिशा में गणपति जी विसर्जन के लिए गए थे। कुछ क़दम आगे जाते ही पक्की सड़क मिल गई और अचानक ही बिना किसी से टकराए, बिना ब्रेक लगाए, आशीष और उसके पीछे बैठा शलभ बाइक समेत फिसलकर सड़क पर धराशाई हो गए। आसपास भीड़ जमा हो गई और जब होश आया तो आशीष के माथे और हाथ पर पट्टी थी और शलभ के सिर पर टाँके तथा पैर में प्लास्टर। दोनों को ही अब तक ये समझ नहीं आ रहा था कि हुआ क्या था। जिन लोगों ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया था उन्होंने बताया कि गणपति जी के प्रसाद के रूप में जो खिचड़ी वितरित की जा रही थी वह नाचने-गाने, गुलाल लगाने इत्यादि के वक्त सड़क पर बिख़र गई थी और बीच सड़क पर बिख़रे उस प्रसाद ने, आशीष और शलभ को अपना ग्रास बना लिया था।

आशीष और शलभ को पूर्ण रूप से ठीक होने में तक़रीबन 8 महीने का समय लगा था। "दादी, प्रसाद लेना लाभदायक होता है या हानिकारक? यह भी तो बताओ, प्रसाद बाँटना शुभ कार्य होता है या विघ्न- कारी? बोलो ना दादी, क्या दोष था मेरा और शलभ का? हमारा पढ़ाई का 1 वर्ष यानी जीवन का 1 वर्ष बर्बाद हो गया दादी", आशीष दादी की गोद भिगोते हुए पूछता ही रहा कई बार, बार-बार इस अनुत्तरित प्रश्न को।


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