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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

परीक्षा

शबनम शर्मा

लाजवंती की शादी को मात्र 6 बरस ही हुए थे कि उसके पति सुरेश की तबीयत खराब हो गई। सुरेश को पता चला कि उसे कैंसर है, उसकी चिन्ता बहुत बढ़ गई। सोचले लगा, उसके बाद उसके परिवार की परवरिश, उसकी दो बहनों की शादी, उसकी माँ की देखभाल, सब सोचकर वह काँप उठा। पत्नि को पता चला तो वह उसे सांत्वना देने लगी कि सब परमात्मा पर छोड़ दो, जो होगा वह उसकी मर्ज़ी से ही होगा। लाजवंती हर काम में बहुत ही सुलझी औरत थी, परन्तु पढ़ी-लिखी न थी, इस बात की चिन्ता सुरेश को खाये जा रही थी। घर की पूरी ज़िम्मेदारी लाजवंती पर आने वाली थी। उसके मेहनती स्वभाव को देखकर सुरेश ने उससे बात करने की सोची। उसे बुलाकर कहने लगा, ‘‘लाजवंती, तुम एक बुद्धिमान, कुशल स्त्री हो, समय अच्छा नहीं है, सोचता हूँ, क्या अच्छा हो कि तुम दसवीं की परीक्षा दो और कोई नौकरी करो, मेरे बाद तुम्हें सबको संभालना है।’’ सुनकर लाजवंती फफक़ पड़ी, ‘‘मैं अनपढ़ गंवार जिसे अ नहीं आता वो दसवीं करेगी, आपने सोच भी कैसे लिया?’’ उसकी पूरी रात सुरेश की बात सोचते-सोचते निकल गई। काले दिन व लम्बी रातें नज़र आने लगी। सुबह उठकर उसने अपनी छोटी बेटी जो नर्सरी में जाती थी, की किताब उठाई, पन्ने पलटने लगी कि आँखों से आँसू रुक ही न रहे थे। सुरेश ने उसे देखा व पास आकर बोला, ‘‘अरे वाह, ये आज से ही शुरु कराता हूँ।’’ उसने किताब के चित्र व अक्षर उसे पढ़ाये। सलेट पर अ-आ, 1-2-3 लिखकर दिया। 2-3 दिन में उसने मेहनत व लगन से अच्छे परिणाम दिय। वह किताबों को पढ़ने व समझने लगी। मात्र 3 सालों में उसने दसवीं की परीक्षा दे डाली व उर्त्तीण हुई। इसके बाद जे.बी.टी. की। इस दौरान सुरेश भी बहुत बीमार रहने लगे और उनका निधन हो गया। लाजवंती पर ज़िम्मेदारियों का पहाड़ टूट पड़ा। उसे सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई। जैसे-तैसे अपना फ़र्ज निभाया। आज उसके बच्चे अपनी-अपनी ज़िन्दगी जी रहे हैं। परन्तु उसका जीवन हमें हमेशा एक अलग सी सीख देता रहेगा कि इन्सान ग़र कुछ चाहे तो क्या नहीं हो सकता।


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