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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

दान

शबनम शर्मा

सिद्धू वकील शहर के जाने-माने वकीलों में गिने जाते हैं। बड़ा बंगला, भले बच्चे, सुशील बीवी, क्या नहीं है उनके पास। उनके घर में नाती हुआ। मैं भी नन्हें मेहमान को देखने चली गई। घर में चारों ओर रौनक ही रौनक। उसके ननिहाल से भी लोग आए हुए थे। अन्दर वाले कमरे में भीड़ थी। सिद्धू जी बाहर वाले बड़े कमरे में बैठे किताबें पलट रहे थे। मुझे देखकर उन्होंने अपने कमरे में बैठने को कहा। चारों ओर किताबें ही किताबें। बड़ा सोफा, कुछ कुर्सियाँ, मेज़ सब कुछ था वहाँ। औपचारिकता ही बातचीत खत्म हुई। मैंने उन्हें बधाई दी और बात आगे बढ़ाने लगी। पूछ ही बैठी, ‘‘सिद्धू साहब, आपके पिताजी का भी यही व्यवसाय रहा?’’ ‘‘नहीं, वो एक जुलाहे हैं, उन्होंने कड़ी मेहनत करके मुझे पढ़ाया। मैं बचपन से पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन घर की परिस्थितियाँ अनुकूल न थीं। मेरी 2 बहनें, दादा-दादी और एक बुआ भी हमारे साथ थी। पिताजी अकेले कमाने वाले थे। रात-दिन काम करते। मैं भी समय मिलते ही उनकी मदद करता। साथ-साथ मैंने पढ़ाई भी की। वकालत की पढ़ाई के लिये पैसे न थे। पिताजी ने अपनी दुकान बेच दी, माँ ने अपने इक्के-दुक्के गहने। मैं वकील बन गया, मेरा काम भी अच्छा चल निकला। मैंने प्रण किया कि मुझे जो भी कुछ आयेगा उसमें से 10ः मैं उन बच्चों के लिए रखूँगा जो पैसे की कमी के कारण पढ़ नहीं पाते। भगवान का शुक्र है मैं आज कुछ कर पाया। मैंने ट्रस्ट बनाया है, मेरे साथ और लोग भी जुड़े हैं। मैंने कक्षा 1 से 8 तक का स्कूल खोला है। किताबें, खाना, वर्दी सब फ्री हैं। करीब 700 बच्चे हो गये हैं और मुझे सुकून है। कहते-कहते उनकी आँखें भर आईं।’’ उनके इस निर्णय पर मुझे बहुत खुशी हुई।


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