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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

भँवर

राजीव कुमार

तीतरा को हर परिस्थिति में मुस्कराना ही पड़ता था। सुबह को अपनी कस्ती पे सवार होकर, मछली पकड़ने के लिए, लहरों से उठा-पटक करना उसकी नियति बन चुकी थी। एक सुनामी ने उसका सबकुछ छिन लिया था और उसको एकदम अकेला कर दिया था। तीतरा को अपनी जीविका के साथ-साथ दुसरों की जीविका के लिए भी काम करना पड़ता था, लहरों से धक्का-मुक्की करनी पड़ती थी। उस दिन उसकी कस्ती में अकेला ही गया था। दोनों चप्पू शांत जल में अपनी गति कर रहे थे। जाने किस सोच में तीतरा डुब हुआ था कि चप्पू पर, कस्ती पर उसका नियंत्रण ही नहीं रहा और कस्ती भंवर की तरफ खिंचती चली गयी, खुद को लाख बचाते हुए भी भंवर में फंस गया। ठीक उसी प्रकार जैसे उसका दुर्भाग्य हमेशा अपनी ओर खिंचता रहा और अन्त में अपना दास बना लिया था और आज भंवर ने उसको अपनी गोद में सुला दिया। तीतरा के जुबान से एक ही आवाज निकली ’’ हे भंवर , मुझको भी मेरे बीबी-बच्चों के पास पहुंचा दे। ’’


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