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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

इज़्ज़तदार

डॉ. प्रेमलता चसवाल 'प्रेमपुष्प'

"पांडे जी! देखो, क्या तमाशा हो रहा है, लाखों लोग कैसे एक बलात्कारी बाबा को बचाने के लिए रात-दिन खुले आसमान के नीचे पड़े मरने-मारने को तैयार बैठे हैं।"

"और वो भी दफ़ा 144 में जी, सेठी साहब!"

"पूरी धौंस है बाबा की। कहाँ की 144 उसके लिए वो तो हमारे-तुम्हारे लिए है, हम पड़ें हैं न घर में कैद।

"और सरकार को देखो क्या काठ मार गई है?"

"सरकार को तो वोटों से ख़रीदा है जैसे इसने।"

सवेरे से टी.वी. पर बाबा की सनसनी-ख़ेज़ ख़बरें देखते हुए पांडे जी जैसे ही अपने फ़्लैट से बाहर टाँगे सीधी करने लिए गैलरी में आए कि सेठी जी सामने पड़ गए, वो भी जैसे अंदर की भड़ास निकालने ही बाहर आए हों।

"वैसे पांडे जी! क्या हो गया है समाज को! हैरानगी होती है कि भारत जैसे देश में धार्मिक ग्रन्थ नारी पूजा की बातें करते हैं, वहीं ये धर्म के ठेकेदार हर छठे दिन नारी-शोषण के काण्ड में कैसे भोले-भाले लोगों को गुमराह करते है! "

"हैरानी कैसी, सेठी भाई! पूरा समाज ही बुरी तरह भ्रष्ट हुआ पड़ा है। बहु-बेटी की इज्ज़त कभी मोहल्ले-गाँव की इज्ज़त मानी जाती थी, अब क्या है? न बेटी महफूज़ है न बच्ची, न ही कोई अधेड़ न ही बूढ़ी। रोज़ अखबार आप भी पढ़ते हो। कोई एक दिन बता दो जब सेक्स हैरासमेंट की ख़बर न छपी हो। आप क्या सोचते हो घरों में बेटियाँ महफूज हैं?"

"क्या बात करते हो, पांडे जी; इतना भी पतन नहीं हुआ होगा समाज का?"

"मैं तो एक बात जानता हूँ, जब भी किसी लड़की से कोई बदसलूकी करता है, अपनी इज़्ज़त बचाने को हमेशा बेक़सूर लड़की को ही दबना या मुँह छुपाना पड़ता है। असली कसूरवार तो छुटे साँड-से और चौड़े होकर घूमते हैं।"

"हाँ जी ये तो बात सही है, पर पांडे जी, जो जवाँ बच्चे ऐसे ग़लत काम करते है उनके घरवाले उन्हें फटकारते क्यों नहीं; ये बात मेरी समझ में नहीं आती। आख़िर बच्चे तो उनके ही बिगड़ते हैं न?"

"किस ज़माने में जी रहे हो सेठी जी और किस दुनिया की बात करते हो!"

"क्यों कुछ गलत कहा? अगर माँ-बाप अपने किशोर बच्चों को समय पर समझा-धमका कर चैक रखें तो अखबारों में रोज़मर्रा ऐसी बेकार ख़बरें न आएं, क्यों?"

"सेठी जी... " झुंझलाते हुए बोले पांडे जी, "अपनी ख्याली दुनिया की बजाए हक़ीक़त में जीओ तभी समझ पाओगे!"

" " सेठी ख़ामोश।

"अरे यार! माँ-बाप उनके साथ साये की तरह खड़े हो जाते हैं, बच्चा शर्मिन्दा हो अपनी ग़लती मानना भी चाहे तो वे अपनी झूठी इज़्ज़त बचाने के लिए सारा इल्ज़ाम किसी बेक़सूर लड़की के माथे मढ़, ख़ुद इज़्ज़तदार बने रहते हैं।


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