मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

दे दे चुनौती काल क्या

ज़हीर अली सिद्दीक़ी

जब उठता हूँ गिरकर मैं ख़ुशी अज़ीब सी होती है गिरकर उठ न सकूँ यदि मैं खिन्नता निर्बल सी होती है।। गिर जाऊं पर उठ जाऊं ऐसा नही की डर जाऊं गिर जाऊं तो लड़ जाऊं लड़ने का डर भर जाऊं।। जीवन एक रणभूमि है गिरना महज़ वसूल नहीं गिरने को यदि गले लगाया उठना सदा-सदा उठ जाता।। अकाल क्या विकराल क्या दे दे चुनौती काल क्या काल का भी हाल क्या उल्टा हुआ बेहाल सा।।

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें