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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

अरमान दिल के

विकास त्रिपाठी

हसरतें बहुत थी दिल लगाने की हमने उनको दिल में बसा कर देख लिया ख्वाहिश जगी चाहत बढ़ी उस चाहत की आग में खुद को जला कर देख लिया। नींद गई चैन गया लुट गया सारा अरमान ख्वाहिशें दबी की दबी रह गईं पूरा न हुआ एक भी अरमान यारों मोहब्बत मत करना इस जमाने की, हसीनाओं से, इनके बदलते हैं हर पल तेवर और ढलते हैं अलग-अलग रंगों में हमने सभी रंगों में खुद को रंग कर देख लिया। ये तुम्हें रंग लेगी अपनी रंगों में नहीं बचेगा कुछ भी उनके सिवा, ऐसे ये तुम्हें बिखेर देगी इनको कदर नहीं चाहत की, हमने इनको चाह कर भी देख लिया। यारो बच कर रहना इनकी कातिल मुस्कुराहट से यही अदा होती है इनकी तुम्हें फंसाने की। हसरते अब ना रही दिल लगाने की हमने प्यार की कश्ती में खुद को डुबो कर देख लिया।


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