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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

रक्त दान पर कविता

डॉ सुशील शर्मा

आज मृत्यु से देखो वो लड़ा है। रक्त के आभाव में मृत पड़ा है। है किसी का भाई वो आँखों का तारा है। आज उसको खून के आभाव ने मारा है। मन द्रवित कर देख लो उन कराहों को। क्या करोगे अनसुना उनकी आहों को। निकालो रक्त की बूंदों को जीवन दान दे दो। आज उस बीमार को वो वरदान दे दो। कहाता ईश्वर है वो जो जीवन बचाता। दान देकर रक्त का बन जाओ विधाता। करो तुम लाख पूजा अर्चना विधाता खुश नहीं होगा। ये खून मिट्टी में मिलेगा इस रक्त का कुछ नहीं होगा। करोड़ो दान करके पुण्य वो हासिल नहीं होगा। हज़ारों साधनाओं का तप भी शामिल नहीं होगा। तुम्हारे रक्त की कुछ चंद बूँदें दान कर दोगे। इस मनुजता पर बड़ा अहसान कर दोगे। तुम्हारा रक्त वीरों का रगो में दौड़ती है जवानी। करोगे दान अपने खून का और बन जाओ कहानी। तुम्हारा रास्ता संजोती हैं उस बीमार की आहें। तुम्हारे खून को तरसीं हैं उस इंसान की राहें। उठो और रक्त का अब दान करने निकल जाओ चलो अब खुद पे अभिमान करने निकल जाओ।


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