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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

वेश्या

सुनील मिश्रा'शोधार्थी'

वेश्यालय में यूं तो आये-गये दिनों-दिन में एक खादी और एक खाकी वेश्यालय की देहरी पर काफी देर तक दुम हिलाते हुए संविधान की उद्देशिका का दृढ़-संकल्प लेकर जन-गण-मन को मंत्रोच्चारण गुनगुनाते हुए शब्दों में वेश्याओं के जिस्म-की लिपटी हुई साड़ी-को परत-दर-परत के साथ जिस्म और पलंग के बीचों-बीच में सत्यमेव जयते को रुंधे हुए स्वर से रटते- ही-रटते गर्भवती वेश्याओं की सिसकियों के गूंज से ही देह कमजोर होती जा रहीं


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