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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

स्कूल के वो दिन

शिशपाल चिनिंया "शशि"

बडी़ उमंग से गया था , उस शिक्षा दरबार में । कुछ सुनसान था मगर , कुछ भीड़ थी घरबार में। प्राथना का वक्त जो हुआ , लगे हम सब कतार में। पुरी हुई प्राथना और जीके , पढ़ रहा अखबार मैं। मंच पर गुरूवर खडे़ थे , नाम था सुल्तान जी सर। कमी रह गयी पता नहीं हो ,रहा पसीने से तर- बतर। आगाज था दिल में , बस आखों में थोडी़ फटकार। सभांला था उस वक्त,उन्होने रूठ गया था जब ससांर। कक्षा में हम जा पहुँचे , आ गये रामलाल जी सर. । हिन्दी क्या बयां करे, जब वो खुद है साहित्यसागर। डर इतना था कहीं ,अधिक गृहकार्य न हो जाये सर*। *(सिर) गलतियों पर लाल घेरा, बस कहते इसे तु दुबारा कर। आ गये राजनिति विज्ञान के , नाम किशन जी सर आवाज थोडी़ मदीं थी , और मदं-मदं हिले अधर*। *(होठ) परिभाषा बताई है राजनिति की, न छोडी़ कोई कसर। एेनक था आखों पर शायद, कमजोर है थोडी़ नजर। अब हम पढे़ंगे भुगोल , आ गये ओमप्रकाश जी सर। तरीका थोडा़ था लाजमी ,न जायेंगे कक्षा से बाहर। न थी उम्र अधिक उनकी , बस घुमते थे ईधर - ऊधर। वॉलिवॉल खेलते थे , मैदान में न रहेगी अब कसर। अग्रेंजी के बादशाह थे , नाम था शिवभगवान जी सर। वाचन का वो लहजा था , रहती थी आशा दिन भर। वो मदमस्त चाल थी , साथ में वो चलने का था हूनर। शरमा जाये काबिलियत तब ,जब सामने हो वो अगर। हिन्दी के वो शहशांह है , नाम है तिलोक जी सर। आवाज में अब रोब है ,थे ज्ञान के अथाह सागर। तीन लोक के हो गये दृश ,समझो देख ली सुरत अगर। जब खुद नहीं है वो तो , क्या सिमित रखेगा जिगर। भीगने का मजा आयेगा, अब सामने है वो मंजर। हरा हो गया हवो हर दिल , जो पडा़ रहता था बंजर। दिल के आर पार है , ज्ञान का वो रक्तरंजीत खजंर। याद रहें नाम तिलोक जी का ,चाहे पडा़ रहे मेरा पजंर। शारीरिक शिक्षक वो , नाम है विजयकांत जी सर। हॉकी उनकी पगडी़ है , वो है इसके सिंह सरदार । हॉकी के लिये छोड़ दिया है,उन्होने खुद को हर बार। याद तो आते है जब निकलें ,नाम हॉकी का ले हरबार। है विज्ञान की वो पाठशाला , भागीरथ जी नाम है। सिवाय विज्ञान उनके ,वो विज्ञान सिर्फ नाम है। कहाँ आजाद है वो , जब विज्ञान ही उनका काम है। खोल देगें हर वो अगर, विज्ञान मे दिमाक कोई जाम है। वो मनोज जी सर , है मोहर वकालत की। उठतें है सवाल जब हो, बात नजाक़त की। डर लगता है थोडा़ बस न सीमा ताकत की गलती क्या चीज है , लकां लगा दे वो आफत की। गणीत के आकार है , वो रामकुमार जी सर। सुत्रों के साकार है , रहे ना विद्यार्थी को कोई डर। गणीत को मान लें कोण, तो प्रकार है रामकुमार जी सर। सुत्र ही नहीं सुत्राधार है रामकुमार जी सर । किसी वक्त ये थे मेरे , स्कूल के विषय शिक्षक। बनकर रहना चाहा है मैनें, हर पल इनका भिक्षक । छुट गया है साथ अब ,रह गयी बस दिल में कसक। टुट गयी ये ढा़ल जो थी हर तुफां की रक्षक। गलती हो तो क्षमा करे , हे ! मेरे गुरूवर । मैं तो बस एक बुदं , आप ही है नीला सागर। अधें को जग दिखाकर, गुगें को बोलना सिखाकर बना दिया है आत्मा की तरह अजर और अमर। आगाज से अजांम तक , आपके कदमों में बयां है कलम। झुकनें दुँगा न झुझने आपका सिर , हो चाहे मेरा सिर कलम। आपने ही तो सिखाया है आवाज उठाना ,और उठाना कलम । न झुकुगाँ कभी मेैं शांत रहकर, झुझकर चाहे सिर हो कलम।

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