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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 70, अक्टूबर(प्रथम), 2019

क्यों कोशिश करते हो

शिखा परी

क्यों कोशिश करते हो हर बार तुम मुझे अपने अंदर समाने की क्यों फिक्र करते हो इतनी ज़माने की मैं भी डूबना चाहती हूँ ,तुम्हारे साथ उस प्यार के दरिया में तुम क्यों नहीं समझते इस दरिया को भी तुम्हारी आँखे मुझे पढ़ती कम घूरती ज़्यादा है तुम क्यों हर बार मुझे जीतने की नादान सी कोशिश करते हो? हर रात तुम खुद क्यों इस उधेड़बुन में उलझ जाते हो? मुझे पढ़ना है तुम्हारी लकीरों में ,एहसास करना है तुम्हारी उन जंजीरो में जिन जंजीरो में तुम हर रात खयड को जकड़ के मेरे पास आते हो हुस्न!ये शब्द बहुत छोटा है ,क्यों तुम इसमें उलझते हो? मैं दिनभर से अपनी पोटली में दिनभर की कहानियों का पिटारा रखती हूँ तुम उस पोटली को रोज़ दूर रखवा देते हो। मैं इस अंधेरे को भी चीर के देखना चाहती हूँ तुमसे बहुत कुछ कहना चाहती हूँ इस दूसरी दुनिया से निकलके तुमसे आम दुनिया की बातें करना चाहती हूँ मैं हँसना चाहती हूँ ,तुमसे खुलकर बोलना चाहती हूँ, तुमसे हरदम कुछ कहना चाहती हूँ, तुम सुन नहीं पाते मुझे इस नासमझी के खेल में तुम अक्सर जीत जाय करते हो। हर बार तुम फिर से उस रस में बह जाया करते हो।।


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